Tulsidas Ke Dohe || Tulsi Das Status And Quotes In Hindi

Hello, friends, Tulsidas ke dohe is a very popular subject as we all know that Tulsidas was a rishi who wrote the scripture called Ramayana.
Ramayana is the Sanatan dharma’s very respected and a massage for human beings how to live life. The Ramayana is based on the life story of Shri Ram Chandra Ji and his wife Devi Sita. So as this post is dedicated to Tulsidas Ji lets discuss His life in short.

Tulsidas biography || Tulsidas Ji ki jeevani

 Goswami Tulsidas was a Hindu Vaishnava holy person and artist, famous for his commitment to the divinity Rama. Tulsidas composed a few famous works in Sanskrit and Awadhi; he is most popular as the creator of the epic Ramcharitmanas, a retelling of the Sanskrit Ramayana dependent on Rama’s life in the vernacular Awadhi. 

Tulsidas went through the greater part of his time on earth in the city of Varanasi. The Tulsi Ghat on the Ganges River in Varanasi is named after him. He established the Sankatmochan Temple devoted to Lord Hanuman in Varanasi, accepted to remain at where he had to see the deity.[6] Tulsidas began the Ramlila plays, a people theater adaption of the Ramayana. 
 
He has been acclaimed as perhaps the best artist in Hindi, Indian, and world writing. The effect of Tulsidas and his takes a shot at the workmanship, culture, and society in India is across the board and supposedly dates in vernacular language, Ramlila plays, Hindustani old-style music, well-known music, and TV arrangement.
 

Tulsidas Ji Ke Dohe

“कठिन कुसंग कुपंथ कराला।तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला।गृह कारज नाना जंजाला।ते अति दुर्गम सैल विसाला।।” 


“सुभ अरू असुभ सलिल सब बहई।सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।समरथ कहुॅ नहि दोश् गोसाईं।रवि पावक सुरसरि की नाई।।” 

“तुलसी देखि सुवेसु भूलहिं मूढ न चतुर नर। सुंदर के किहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।”

Tulsidas Ke dohe


“बडे सनेह लघुन्ह पर करहीं।गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।जलधि अगाध मौलि बह फेन।संतत धरनि धरत सिर रेनू।।” 

“बैनतेय बलि जिमि चह कागू।जिमि ससु चाहै नाग अरि भागू।जिमि चह कुसल अकारन कोही।सब संपदा चहै शिव द्रोही।।”

“ग्रह भेसज जल पवन पट पाई कुजोग सुजोग।होहिं कुवस्तु सुवस्तु जग लखहिं सुलक्षन लोग।।”


“तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंगतूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।” 

“सुनहु असंतन्ह केर सुभाउ।भूलेहुँ संगति करिअ न काउ।तिन्ह कर संग सदा दुखदाई।जिमि कपिलहि घालइ हरहाई।।”

“खलन्ह हृदयॅ अति ताप विसेसी ।जरहिं सदा पर संपत देखी।जहॅ कहॅु निंदासुनहि पराई।हरसहिं मनहुॅ परी निधि पाई।।”



“काम क्रोध मद लोभ परायन।निर्दय कपटी कुटिल मलायन।वयरू अकारन सब काहू सों।जो कर हित अनहित ताहू सों।।” 
Tulsidas Ke Dohe

“झूठइ लेना झूठइदेना।झूठइ भोजन झूठ चवेना।बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा।खाइ महा अति हृदय कठोरा।।” 

“पर द्रोही पर दार पर धन पर अपवाद। तें नर पाॅवर पापमय देह धरें मनुजाद।।”


“लोभन ओढ़न लोभइ डासन।सिस्नोदर नर जमपुर त्रास ना।काहू की जौं सुनहि बड़ाई।स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।” 

“जब काहू कै देखहिं बिपती।सुखी भए मानहुॅ जग नृपति।स्वारथ रत परिवार विरोधी।लंपट काम लोभ अति क्रोधी।।”

“मातु पिता गुर विप्र न मानहिं।आपु गए अरू घालहिं आनहि।करहिं मोहवस द्रोह परावा।संत संग हरि कथा न भावा।।”

“अवगुन सिधुं मंदमति कामी।वेद विदूसक परधन स्वामी।विप्र द्रोह पर द्रोह बिसेसा।दंभ कपट जिएॅ धरें सुवेसा।।”

“भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी।बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।सत संगति संसृति कर अंता।।”

“जेहि ते नीच बड़ाई पावा।सो प्रथमहिं हति ताहि नसाबा।धूम अनल संभव सुनु भाई।तेहि बुझाव घन पदवी पाई।।”

“रज मग परी निरादर रहई।सब कर पद प्रहार नित सहई।मरूत उड़ाव प्रथम तेहि भरई।पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।।”

“सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा।बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।कवि कोविद गावहिं असि नीति।खल सन कलह न भल नहि प्रीती।।”

“सन इब खल पर बंधन करई ।खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।खल बिनु स्वारथ पर अपकारी।अहि मूशक इब सुनु उरगारी।।”



“पर संपदा बिनासि नसाहीं।जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।दुश्ट उदय जग आरति हेतू।जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।।”



“रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।अजहुॅ देत दुख रवि ससिहि सिर अवसेशित राहु।।” 

“भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ विधाता वाम। धूरि मेरूसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम।।” 


“सुख संपति सुत सेन सहाई।जय प्रताप बल बुद्धि बडाई।नित नूतन सब बाढत जाई।जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।।” 


Tulsidas Ke Dohe

“जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीढी।नहि पावहिं परतिय मनु डीठी।मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं।ते नरवर थोरे जग माहीं।।”



“काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।तिय विसेश पुनि चेरि कहि भरत मातु मुसकानि।।” 


“रहा प्रथम अब ते दिन बीते।समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते।।” 


“अरि बस दैउ जियावत जाही।मरनु नीक तेहि जीवन चाहीै।।”

“कवने अवसर का भयउॅ नारि विस्वास।जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्या नास।।”

Tulsidas Ke Dohe


“दुइ कि होइ एक समय भुआला।हॅसब ठइाइ फुलाउब गाला।दानि कहाउब अरू कृपनाई।होइ कि खेम कुसल रीताई।।”  





“सत्य कहहिं कवि नारि सुभाउ।सब बिधि अगहु अगाध दुराउ।निज प्रतिबिंबु बरूकु गहि जाई।जानि न जाइ नारि गति भाई।।”

“काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।का न करै अवला प्रवल केहि जग कालु न खाइ।।”  


“जहॅा लगि नाथ नेह अरू नाते।पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।तनु धनु धामु धरनि पुर राजू।पति विहीन सबु सोक समाजू।।”  


“सुभ अरू असुभ करम अनुहारी।ईसु देइ फल हृदय बिचारी।करइ जो करम पाव फल सोई।निगम नीति असि कह सबु कोई।।”

“काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।” 

Tulsidas Ke Dohe

“जोग वियोग भोग भल मंदा।हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।जनमु मरनु जहॅ लगि जग जालू।संपति बिपति करमु अरू कालू।।”

“बिधिहुॅ न नारि हृदय गति जानी।सकल कपट अघ अवगुन खानी।।” 



“सुनहुॅ भरत भावी प्रवल विलखि कहेउ मुनिनाथ।हानि लाभ जीवनु मरनु जसु अपजसु विधि हाथ।।” 




“विशय जीव पाइ प्रभुताई।मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।”  


“सुनिअ सुधा देखिअहि गरल सब करतूति कराल।जहॅ तहॅ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।”

“सुनि ससोच कह देवि सुमित्रा ।बिधि गति बड़ि विपरीत विचित्रा।तो सृजि पालई हरइ बहोरी।बालकेलि सम बिधि मति भोरी।।”

“मैं अरू मोर तोर तैं माया।जेहिं बस कहन्हें जीव निकाया।।” 

“नवनि नीच कै अति दुखदाई।जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।भयदायक खल कै प्रिय वानी ।जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।”

“कबहुॅ दिवस महॅ निविड़ तम कबहुॅक प्रगट पतंग।बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।”

“भानु पीठि सेअइ उर आगी।स्वामिहि सर्व भाव छल त्यागी।।” 

Tulsidas Ke dohe


“हित मत तोहि न लागत कैसे।काल विबस कहुॅ भेसज जैसे।।” 

“भानु पीठि सेअइ उर आगी।स्वामिहि सर्व भाव छल त्यागी।।”

“उमा संत कइ इहइ बड़ाई।मंद करत जो करइ भलाई।।”

“कादर मन कहुॅ एक अधारा।दैव दैव आलसी पुकारा।।”



“नहिं दरिद्र सम दुख जग माॅहीं।संत मिलन सम सुख जग नाहीं।पर उपकार बचन मन काया।संत सहज सुभाउ खगराया।।” 

“मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।काम वात कफ लोभ अपारा।क्रोध पित्त नित छाती जारा।।”

“सोहमस्मि इति बृति अखंडा।दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।आतम अनुभव सुख सुप्रकासा।तब भव मूल भेद भ्रमनासा।।”  

“छिति जल पावक गगन समीरा।पंच रचित अति अधम सरीरा।।” 



“जो आपन चाहै कल्याना।सुजस सुमति सुभ गति सुख नाना।सो परनारि लिलार गोसांई।तजउ चउथि के चाॅद की नाई।।”  

“जनम मरन सब दुख सुख भोगा।हानि लाभ प्रिय मिलन वियोगा।काल करम बस होहिं गोसाईं।बरबस राति दिवस की नाईं।।”

Tulsidas Ke Dohe

“सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं।दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।धीरज धरहुं विवेक विचारी।छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।” 

“जनि मानहुॅ हियॅ हानि गलानी।काल करम गति अघटित जानी।।”




“सोचिअ गृही जो मोहवस करइ करम पथ त्याग।सोचिअ जती प्रपंच रत विगत विवेक विराग।।”  

Tulsidas Ke Dohe

“अनुचित उचित विचारू तजि जे पालहिं पितु बैनते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।”

“करम प्रधान विस्व करि राखा।जो जस करई सो तस फलु चाखा।।”




“बिनु विस्वास भगति नहि तेहि बिनु द्रवहि न रामु।राम कृपा बिनु सपनेहुॅ जीव न लह विश्राम।।” 


“हरश विशाद ग्यान अज्ञाना।जीव धर्म अह मिति अभिमाना।।”

“अग जग जीव नाग नर देवा।नाथ सकल जगु काल कलेवा।अंड कटाह अमित लय काटी।कालु सदा दुरति क्रम भारी।।”

“अघ कि पिसुनता सम कछु आना।धर्म कि दया सरिस हरि जाना।।”

“क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान।मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान।।”

“कबहुॅ कि दुख सब कर हित ताकें।तेहि कि दरिद्र परसमनि जाकें।परद्रोही की होहिं निसंका।कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।।”

“बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें।कर्म कि होहिं स्वरूपहिं चीन्हें।काहू सुमति कि खल संग जामी।सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।।”

“जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।तिन्हहि विलोकत पातक भारी।निज दुख गिरि सम रज करि जाना।मित्रक दुख रज मेरू समाना।। ”

“जिन्हकें अति मति सहज न आई।ते सठ कत हठि करत मिताई।कुपथ निवारि सुपंथ चलावा ।गुन प्रगटै अबगुनन्हि दुरावा।। ”

“देत लेत मन संक न धरई।बल अनुमान सदा हित करई।विपति काल कर सतगुन नेहा।श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।”

“आगें कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई।जाकर चित अहिगत सम भाई।अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।।”

“सेवक सठ नृप कृपन कुमारी।कपटी मित्र सूल सम चारी।सखा सोच त्यागहुॅ मोरें।सब बिधि घटब काज मैं तोरे।”

“शत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं।माया कृत परमारथ नाहीं।।”

“सुर नर मुनि सब कै यह रीती।स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।”

“बंदउ गुरू पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरिमहामोह तम पुंज जासु बचन रवि कर निकर।।”

Tulsidas Ke Dohe

“बंदउ गुरू पद पदुम परागा।सुरूचि सुवास सरस अनुरागा।अमिय मूरिमय चूरन चारू।समन सकल भव रूज परिवारू।।’

“श्री गुरू पद नख मनि गन जोती।सुमिरत दिब्य दृश्टि हियॅ होती।दलन मोह तम सो सप्रकाशू।बडे भाग्य उर आबई जासू।।”

“गुरू पद रज मृदु मंजुल अंजन।नयन अमिअ दृग दोश विभंजन।तेहि करि विमल विवेक बिलोचन।बरनउॅ राम चरित भव मोचन।।”

“संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुराण मुनि गाव। होई न विमल विवेक उर गुर सन किए दुराव।।”

“तुलसी जसि भवितव्यता तैसी मिलई सहाइ।आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाॅ ले जाइ।।”

“जदपि मित्र प्रभु पितु गुरू गेहा।जाइअ बिनु बोलेहुॅ न संदेहा।तदपि बिरोध मान जहॅ कोई।तहाॅ गए कल्यान न होई।।”

“गुर के वचन प्रतीति न जेही।सपनेहुॅ सुगम न सुख सिधि तेही।।”

Tulsidas Ke Dohe

“जे गुरू चरन रेनु सिर धरहिं।ते जनु सकल विभव बस करहीं।।”

“सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करई सिर मानि।सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।”

Tulsidas Ke dohe

“सेवक सुमिरत नामु सप्रीती।बिनु श्रम प्रवल मोह दलु जीती।फिरत सनेहॅ मगन सुख अपने।नाम प्रसाद सोच नहि सपने।।”

“प्रभु समरथ सर्वग्य सिव सकल कला गुण धाम। जोग ग्यान वैराग्य निधि प्रनत कलपतरू नाम।।”

“अग जगमय सब रहित विरागी।प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।।”

“बिप्र धेनु सुर संत हित लिन्ह मनुज अवतार।निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।”

“ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुण नाम न रूप। भगत हेतु नाना विधि करत चरित्र अनूप।।”

‘जिन्ह के रही भावना जैसी।प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।”

“जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू।सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू।।”

“का बरसा सब कृसी सुखाने।समय चुकें पुनि का पछताने।।”

“कह मुनीस हिमवंत सुनु जो विधि लिखा लिलार।देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनहार।।”

Tulsidas Ke Dohe

“मातु पिता गुर प्रभु के वाणी।विनहिं विचार करिअ सुभ जानी।।”

“पर हित लागि तजई जो देही।संतत संत प्रसंसहि तेहीं।।”

“ता कहुॅ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।तव प्रभाव बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल।।”

“बन बहु विशम मोह मद माना। नदी कुतर्क भयंकर नाना।।”

“बड अधिकार दच्छ जब पावा।अति अभिमानु हृदय तब आबा।नहि कोउ अस जनमा जग माहीं।प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं।।”

“तेहिं ते कहहिं संत श्रुति टेरें।परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।।”

“सूर समर करनी करहि कहि न जनावहिं आपू। विद्यमान रन पाई रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।”

“लखन कहेउ हॅसि सुनहु मुनि क्रोध पाप कर मूल। जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं विस्व प्रतिकूल।।”

 Conclusion:- 

So These are the Tulsidas ke dohe. These are Tulsidas Doha’s can be shared and use as the tulsi das status and quotes in Hindi. These some of them are Ramayana’s Doha and status on Ramayan. So we hope you like them well and do check our more pages.
 
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